जांजगीर-चांपा. दिल में यदि हौसले हो तो विकलांगता बाधा नहीं बनती। हौसलों की उड़ान जिगर से भरी जा सकती है। कुछ इसी तरह के हौसलों से बलौदा के वार्ड नंबर १४ निवासी सुनील कुमार गोस्वामी अपनी परिवार की गाड़ी चला रहा है। मूलत: एक पांव से दिव्यांग के पास खटारा साइकिल है और वह उसी साइकिल में एक पांव से पाइडिल मारकर ४० से ५० किलोमीटर का सफर तय कर गांव की गलियों में केस कतरन के बदले खिलौने बेचता है और अपनी परिवार की गाड़ी पिछले दस सालों से चला रहा है। वह इस काम के बदौलत अपने परिवार के पांच लोगों (दो लड़की, दो लड़का व पत्नी) का पेट पालता है।
पेट की भूख आखिर क्या करने मजबूर नहीं देता। इसके लिए विकलांगता आड़े नहीं आती। दरअसल, हादसे में एक पांव गंवाने के बाद भी सुनील ने जिंदगी से हार नहीं मानी और लगातार बाल बच्चों का पेट पालने के लिए संघर्ष करता रहा। वह गांव -गांव घूम-घूमकर केस कतरन इकट्ठा करता है और केस के बदले बच्चों को खिलौने देता है। इस काम से उसे पेट पालने के लायक खर्च की राशि मिल जाती है। सुनील कुमार ने बताया कि वह हर रोज बलौदा क्षेत्र के गांव पहरिया, पोंच, पंतोरा सहित तकरीबन एक दर्जन गांवों में केवल एक पांव में साइकिल की पाइडिल मारकर ४० से ५० किलोमीटर का सफर करता है। दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद उसे १०० से २०० रुपए मिल जाता है। जिससे उसका परिवार चल जाता है।
2008 में ट्रेन में चढ़ते वक्त गवां बैठा था पांव
सुनील कुमार गोस्वामी ने बताया कि वह वर्ष २००८ में अकलतरा से बिलासपुर से जा रहा था। ट्रेन में सवार होते वक्त उसके पांव फिसल गया और वह पटरी में आ गया। उसकी जान बच गई लेकिन एक पांव उसे गवाना पड़ा। एक पांव गवाने के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी और लगातार परिवार की भूख मिटाने के लिए लगातार संघर्ष करता रहा।
सरकार की योजनाओं से महरूम सुनील
यूं तो सरकार दिव्यांगों के लिए कई योजनाओं का संचालन कर रही, लेकिन सुनील के लिए सरकार की योजनाएं कौड़ी काम की नहीं है। उसने बताया कि पहले वह शासन की योजनाओं का लाभ के लिए दर-दर भटकता रहा, लेकिन सरकारी दफ्तरों से केवल उसे निरासा ही हाथ लगी। उसने शासकीय दफ्तरों की ओर पलटकर नहीं देखा और खुद के हौसलों को बुलंद कर कड़ी मेहनत की ठान ली।
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